कभी फुर्सत हो तो जगदम्बे, निर्धन के घर भी आ जाना |
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना ||
ना छत्र बना सका सोने का, ना चुनरी घर मेरे टारों जड़ी |
ना पेडे बर्फी मेवा है माँ, बस श्रद्धा है नैन बिछाए खड़े ||
इस श्रद्धा की रख लो लाज हे माँ, इस विनती को ना ठुकरा जाना |
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना ||
जिस घर के दिए मे तेल नहीं, वहां जोत जगाओं कैसे |
मेरा खुद ही बिशोना डरती माँ, तेरी चोंकी लगाऊं मै कैसे ||
जहाँ मै बैठा वही बैठ के माँ, बच्चों का दिल बहला जाना |
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना ||
तू भाग्य बनाने वाली है, माँ मै तकदीर का मारा हूँ |
हे दाती संभाल भिकारी को, आखिर तेरी आँख का तारा हूँ ||
मै दोषी तू निर्दोष है माँ, मेरे दोषों को तूं भुला जाना |
जो रूखा सूखा दिया हमें, कभी उस का भोग लगा जाना ||

दोहा: ब्रह्मा जी को आन छुड़ाया मधुकैटब के बल से |माँ ने रूप धर शिव को बचाया, भस्मासुर के छल से ||सब देवो पर हुई सहाई, माँ दुष्टों के दल से |और भक्तो की है प्यास भुझाई चरण गंगा के जल से ||
अब मेरी भी सुनो हे मात भवानी |मै तेरा ही बालक हूँ, जगत महारानी ||
सिंह सवारी करने वाली तेरी शान निराली है |तू है शारदा, तू ही लक्ष्मी, तू ही महाकाली है ||शुंभ-निशुम्भ पापी तूने संघारे,महिषासुर के जैसे तुमने ही मारे |भक्तो के सारे संकट तुमने ही टारे, मै भी हूँ आया मैया तेरे द्वारे |तेरा यश है उज्वल निर्मल जू गंगा का पानी ||
ब्रह्मा विष्णु शंकर ने भी आध्शक्ति को माना है |जय जगदम्बे जय जगदम्बे वेद पुराण बखाना है ||शक्ति से ही सेवा होती, शक्ति से ही मान है |शक्ति से ही विजयी होता हर इंसान है ||शक्ति से ही भक्ति होती, भक्ति मे कल्याण माँ |दे दो मुझे भी भक्ति, गाउन गुणगान माँ |कैसे मै गुणगान करूँ, मै तो हूँ अज्ञानी ||
कण कण मे है देखी सबने कैसे जोत समायी है |भीड़ पड़े जब भक्तो पे माँ दोडी दोडी आई है ||मेरी पुकार सुन लो, दर्श दिखा दो,कर दो दया की दृष्टि, गले से लगा लो |भक्तो का मैया तुमने भाग सवारा,आया शरण मे प्रियतम मिश्रI एक दुखिआरा |कर प्रियतम मिश्रI पे ओ मैया मेहरबानी ||
हे माँ मुझको ऐसा घर दे, जिसमे तुम्हारा मंदिर हो,
ज्योत जगे दिन रैन तुम्हारी, तुम मंदिर के अन्दर हो।
हे माँ, हे माँ, हे माँ, हे माँ
जय जय माँ, जय जय माँ
इक कमरा जिसमे तुम्हारा आसन माता सजा रहे,
हर पल हर छिन भक्तो का वहां आना जान लगा रहे।
छोटे बड़े का माँ उस घर में एक सामान ही आदर हो,
ज्योत जगे दिन रैन तुम्हारी, तुम मंदिर के अन्दर हो॥
इस घर से कोई भी खाली कभी सवाली जाए ना,
चैन ना पाऊं तब तक दाती जब तक चैन वो पाए ना।
मुझको दो वरदान दया का, तुम तो दया का सागर हो,
ज्योत जगे दिन रैन तुम्हारी, तुम मंदिर के अन्दर हो॥
मैं बालक तू माता, शेरां वालीये,
है अटूट यह नाता, शेरां वालीये |
शेरां वालीये माँ, पहाडा वालीये माँ,
मेहरा वालीये माँ, ज्योतां वालीये माँ ||
तेरी ममता, मिली है मुझको, तेरा प्यार मिला है |
तेरे आँचल की छाया मे मन का फूल खिला है ||
तूने बुद्धि तूने साहस तूने ज्ञान दिया |
मस्तक उचा कर के जीने का वरदान दिया माँ ||
तू है भाग्यविदाता, शेरां वालीये |
मैं बालक तू माता, शेरां वालीये ||
जब से दो नैनो मे तेरी पावन ज्योत समायी |
मन्दिर मन्दिर तेरी मूरत देने लगी दिखाई ||
ऊँचे परबत पर मैंने भी डाल दिया है डेरा |
निस दिन करे जो तेरी सेवा मै वो दास हूँ तेरा ||
रहूँ तेरे गुण गाता, शेरां वालीये |
मैं बालक तू माता, शेरां वालीये ||
जय शेरा वाली, जय भावना वाली |
जय मेहरा वाली, जय ज्योता वाली ||
कैसी यह देर लगाई दुर्गे,हे मात मेरी हे मात मेरी।भव सागर में घिरा पड़ा हूँ,काम आदि गृह में घिरा पड़ा हूँ।मोह आदि जाल में जकड़ा पड़ा हूँ।हे मात मेरी हे मात मेरी॥ना मुझ में बल है, ना मुझ में विद्या,ना मुझ ने भक्ति ना मुझ में शक्ति।शरण तुम्हारी गिरा पड़ा हूँ,हे मात मेरी हे मात मेरी॥ना कोई मेरा कुटुम्भ साथी,ना ही मेरा शरीर साथी।आप ही उभारो पकड़ के बाहें,हे मात मेरी हे मात मेरी॥चरण कमल की नौका बना कर,मैं पार हूँगा ख़ुशी मना कर।यम दूतों को मार भगा कर,हे मात मेरी हे मात मेरी॥सदा ही तेरे गुणों को गाऊं,सदा ही तेरे सरूप को धयाऊं।नित प्रति तेरे गुणों को गाऊं,हे मात मेरी हे मात मेरी॥ना मैं किसी का ना कोई मेरा,छाया है चारो तरफ अँधेरा।पकड़ के ज्योति दिखा दो रास्ता,हे मात मेरी हे मात मेरी॥शरण पड़े हैं हम तुम्हारी,करो यह नैया पार हमारी।कैसी यह देरी लगाई है दुर्गे,हे मात मेरी हे मात मेरी॥
जय माता दी जय माता
ऐसा प्यार बहा दे मैया, चरणों से लग जाऊ मैं ।सब अंधकार मिटा दे मैया, दरस तेरा कर पाऊं मैं ।।
जग मैं आकर जग को मैया, अब तक न मैं पहचान सका |क्यों आया हूँ कहाँ है जाना, यह भी ना मै जान सका |तू है अगम अगोचर मैया, कहो कैसे लख पाऊं मैं ||
कर कृपा जगदम्बे भवानी, मैं बालक नादान हूँ |नहीं आराधनi जप तप जानूं, मैं अवगुण की खान हूँ |दे ऐसा वरदान हे मैया, सुमिरन तेरा ग़ाऊ मैं ।|
मै बालक तू माया मेरी, निष् दिन तेरी ओट है |तेरी कृपा से ही मिटेगी, भीतर जो भी खोट है |शरण लगा लो मुझ को मईया, तुज पे बलि बलि जाऊ मैं ||
गीता - सार
- क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थडरते हो? कौन तुम्हें मार सक्ता है? आत्मा नापैदा होती है, न मरती है।
- जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वहअच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा हीहोगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्यकी चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
- तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्यालाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदाकिया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकरआए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहींपर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया।जो दिया, इसी को दिया।
- खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जोआज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसोंकिसी और का होगा। तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नतातुम्हारे दु:खों का कारण है।
- परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्युसमझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण मेंतुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे हीक्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा,छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो,फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
- न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो।यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बनाहै और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मास्थिर है - फिर तुम क्या हो?
- तुम अपने आपको भगवान के अर्पित करो।यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारेको जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदामुक्त है।
- जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पणकरता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्तका आन्दन अनुभव करेगा।